शक्तिकांत दास को आरबीआई का गवर्नर नियुक्त किए जाने पर सुब्रमण्यम
स्वामी नाराज़ हैं और उनका कहना है कि वो नहीं समझ सकते हैं कि जिस आदमी को
उन्होंने वित्त मंत्रालय से बाहर करवाया था, उसे देश के केंद्रीय बैंक का
मुखिया कैसे बना दिया गया.
जोगी ने ख़ुद अपने को 'सपनों का सौदागार' कहा था.
साल 2000 में जब जोगी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने कहा था, ''हाँ मैं सपनों का सौदागर हूँ. मैं सपने बेचता हूँ.''
लेकिन 2003 में हुए विधानसभा चुनावों में 'सपनों के सौदागर' को हार का सामना करना पड़ा. फिर 2008 में और 2013 में भी वो सपने नहीं बेच पाए.
आख़िरकार अजीत जोगी ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया और छत्तीसगढ़ में अपनी एक नई पार्टी बनाई.
छत्तीसगढ़ की राजनीति में दो मुख्य खिलाड़ी ही रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस.
किसी मज़बूत और ज़मीनी पकड़ रखने वाले क्षेत्रीय दल की कमी की वजह से प्रदेश के लोगों के पास बस ये दो ही विकल्प थे.
अजित जोगी ने विकल्प देने के लिए जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ नाम के एक राजनीतिक दल का गठन किया, वो भी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले.
फिर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करते हुए खुद के बारे में कहा कि इन चुनावों में वो 'किंगमेकर' की भूमिका निभाएंगे. यानी जिसे वो चाहेंगे उसके हाथों में छत्तीसगढ़ की सत्ता की बागडोर होगी.
लेकिन उनका ये गठबंधन 'फ्लाप' साबित हुआ और कांग्रेस की आंधी में भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का भी प्रदर्शन निराशाजनक रहा.
अजीत जोगी की पार्टी 2018 विधानसभा चुनावों में भी सिर्फ़ तीन सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई.
हालांकि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अजित जोगी का कांग्रेस पार्टी से जाना उनके लिए 'वरदान' बन गया.
बघेल कहते हैं, "अगर अजित जोगी पहले चले गए होते तो कांग्रेस प्रदेश में पहले ही सत्ता क़ायम कर लेती. उन्होंने पार्टी के अंदर रहकर पार्टी को ही ज़्यादा नुकसान पहुंचाया है. वो कांग्रेस के प्रत्याशियों को हरवाने का काम करते रहे."
कांग्रेस पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अपने मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने विकास के काम तो किए. लेकिन जल्द ही उनकी छवि 'डर के सौदागर' की बननी शुरू हो गई.
नंगे पैर स्कूल जाने से लेकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई और ईसाई धर्म अपनाने से लेकर प्रशासनिक सेवा तक के सफ़र ने जोगी को परिपक्व बना दिया.
जानकारों को लगता है कि इसी परिपक्वता ने उनमें वो गुण भर दिए, जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'तिकड़म' कहा जाता है.
जोगी को इसका 'बादशाह' माना जाने लगा.
इसीलिए उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही भारतीय जनता पार्टी में सेंध मार दी और उनके 12 विधायकों को अपने साथ शामिल कर लिया.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उनकी इस खूबी की वजह से ही कांग्रेस पार्टी का हाई कमान उनपर भरोसा करता था और छोटे से प्रदेश यानी छत्तीसगढ़ के मामलों में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता था.
साल 2004 में एक सड़क हादसे में वो बाल बाल बच तो गए लेकिन उनकी कमर से नीचे का हिस्सा काम करना बंद कर चुका था और वो 'व्हील चेयर' पर आ गए.
इस दुर्घटना ने उनके जज़्बे को कम नहीं किया और जो वो चाहते रहे वो कांग्रेस पार्टी में होता रहा. चाहे टिकट का बंटवारा हो या टिकट काटना हो.
अजीत जोगी की राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि अभी उनका दल नया है. कुछ सालों में या अगले विधानसभा के चुनावों के आते-आते तक शायद जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ प्रदेश का एक बड़ा क्षेत्रीय दल बनकर उभरें. क्योंकि अजित जोगी ऐसा करने में सक्षम हैं और वो राजनीतिक तिकड़मों को अच्छे से समझते हैं.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई. फिर बने आईपीएस और फिर आईएएस से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद तक का सफ़र तय करने वाले अजीत जोगी.
अजीत जोगी राजनीति के धुरंधरों में गिने जाते रहे हैं. अजीत जोगी को 'सपनों का सौदागर' भी कहा जाता रहा है.जोगी ने ख़ुद अपने को 'सपनों का सौदागार' कहा था.
साल 2000 में जब जोगी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने कहा था, ''हाँ मैं सपनों का सौदागर हूँ. मैं सपने बेचता हूँ.''
लेकिन 2003 में हुए विधानसभा चुनावों में 'सपनों के सौदागर' को हार का सामना करना पड़ा. फिर 2008 में और 2013 में भी वो सपने नहीं बेच पाए.
आख़िरकार अजीत जोगी ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया और छत्तीसगढ़ में अपनी एक नई पार्टी बनाई.
छत्तीसगढ़ की राजनीति में दो मुख्य खिलाड़ी ही रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस.
किसी मज़बूत और ज़मीनी पकड़ रखने वाले क्षेत्रीय दल की कमी की वजह से प्रदेश के लोगों के पास बस ये दो ही विकल्प थे.
अजित जोगी ने विकल्प देने के लिए जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ नाम के एक राजनीतिक दल का गठन किया, वो भी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले.
फिर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करते हुए खुद के बारे में कहा कि इन चुनावों में वो 'किंगमेकर' की भूमिका निभाएंगे. यानी जिसे वो चाहेंगे उसके हाथों में छत्तीसगढ़ की सत्ता की बागडोर होगी.
लेकिन उनका ये गठबंधन 'फ्लाप' साबित हुआ और कांग्रेस की आंधी में भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का भी प्रदर्शन निराशाजनक रहा.
अजीत जोगी की पार्टी 2018 विधानसभा चुनावों में भी सिर्फ़ तीन सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई.
हालांकि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अजित जोगी का कांग्रेस पार्टी से जाना उनके लिए 'वरदान' बन गया.
बघेल कहते हैं, "अगर अजित जोगी पहले चले गए होते तो कांग्रेस प्रदेश में पहले ही सत्ता क़ायम कर लेती. उन्होंने पार्टी के अंदर रहकर पार्टी को ही ज़्यादा नुकसान पहुंचाया है. वो कांग्रेस के प्रत्याशियों को हरवाने का काम करते रहे."
कांग्रेस पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अपने मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने विकास के काम तो किए. लेकिन जल्द ही उनकी छवि 'डर के सौदागर' की बननी शुरू हो गई.
नंगे पैर स्कूल जाने से लेकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई और ईसाई धर्म अपनाने से लेकर प्रशासनिक सेवा तक के सफ़र ने जोगी को परिपक्व बना दिया.
जानकारों को लगता है कि इसी परिपक्वता ने उनमें वो गुण भर दिए, जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'तिकड़म' कहा जाता है.
जोगी को इसका 'बादशाह' माना जाने लगा.
इसीलिए उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही भारतीय जनता पार्टी में सेंध मार दी और उनके 12 विधायकों को अपने साथ शामिल कर लिया.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उनकी इस खूबी की वजह से ही कांग्रेस पार्टी का हाई कमान उनपर भरोसा करता था और छोटे से प्रदेश यानी छत्तीसगढ़ के मामलों में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता था.
साल 2004 में एक सड़क हादसे में वो बाल बाल बच तो गए लेकिन उनकी कमर से नीचे का हिस्सा काम करना बंद कर चुका था और वो 'व्हील चेयर' पर आ गए.
इस दुर्घटना ने उनके जज़्बे को कम नहीं किया और जो वो चाहते रहे वो कांग्रेस पार्टी में होता रहा. चाहे टिकट का बंटवारा हो या टिकट काटना हो.
अजीत जोगी की राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि अभी उनका दल नया है. कुछ सालों में या अगले विधानसभा के चुनावों के आते-आते तक शायद जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ प्रदेश का एक बड़ा क्षेत्रीय दल बनकर उभरें. क्योंकि अजित जोगी ऐसा करने में सक्षम हैं और वो राजनीतिक तिकड़मों को अच्छे से समझते हैं.
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